सोमवार, 18 मई 2009

चाहे जैसे जीतो जीत तो आखिर जीत है

कौन जीता कौन हारा इससे जनता को कोई सरोकार नही है शेयर मार्केट नें एतिहासिक उछाल मारी इससे जनता का कोई लेना देना नही है , जनता को इस बात से फर्क नही पडता कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए ना बनाया जाए उसे सिर्फ अपनी दाल रोटी की चिंता लगी हुई है । महंगाई बेदम बढ गई हैं हर सामान का दाम बढ रहा है पेट्रोल डीजल के भाव कम होने के बाद भी सरकार ने कम नही किए अगर इस दौर में कोई चीज सस्ती हुई है तो वह है आम जनता की जान .. कभी नक्सलीयों से तो कभी आतंकवादियों के हाथों- इनसे बच गए तो पुलिस के हाथों या समाज के ठेकेदारों के हाथों इसे मरना ही मरना है । जनता को इस बात से कोई मतलब नही कि अब काला धन कांग्रेस क्यों लाएगी क्योंकि सारा धन उसी का तो वहां जमा है, उसे परवाह नही कि किस ठेके से नेताओं को कितना पैसा मिला उसे इस बात की भी चिंता नही कि उसके घर के आगे वनने वाली सडक में केवल डामर बिठाया जा रहा है - उसे मतलब है अपनी मेहनत से कमाए पैसों की जिनसे वह घर चला सके, उसे परवाह है अपने बच्चों के भविष्य की, उसे चिंता है आने वाले कल की कल वह पैसे कैसे कमाएगा ।

एनडीए की सरकार बनती तो क्या होता. एक कमजोर सा बुढ्ढा आदमी जो इतना सठिया गया है कि उसे कमजोर का अर्थ तक मालूम ना हो वह क्या प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो सकता था. उत्तर प्रदेश की जनता नें कांग्रेस के पक्ष में वोट नही दी है बल्कि उसका मत आडवाणी जी के विरूद्ध गया है. क्यों ** क्योंकि यही वो शख्स थे जिन्होने रामरथ निकाल कर भारतीय हिंदुओं में एक नया जोश पैदा किये लेकिन जब सत्ता में आए तो सब भूल गए, वो भूल गए अटल जी के कहे चुनावपूर्व शब्दों को कि कोई भी ऐसा बयान मत दो जिसे बाद में पूरा ना किया जा सके लेकिन उन्होने अपनी सिंधी बुद्धि का अच्छा प्रयोग करते हुए सत्ता पर बैठ गए और जिस तरह से इस देश का हर सिंधी व्यवसाई अपनी व्यापारिक बुद्धि चलता है उन्होने भी यहां सिंधी चाल चलने की कोशिशें की उन्होने स्वयंभू लौहपुरूष कहलाना पसंद किए जिससे उनमें एक मद का भाव आ गया वे मनमोहन को कमजोर कहते हुए भूल गए कि मनमोहन नें तो परमाणु मुद्दे पर अपनी सरकार को दांव पर लगा दिए थे लेकिन आडवाणी जी तो आतंकवादीयों को कांधार तक छोडकर आए ।
मैं बीजेपी या संघ को कभी दोषी नही ठहरा सकता क्योंकि ये एक अनुशासित संगठन है लेकिन जिस व्यक्ति के कारण सारे देश में बीजेपी को हार का सामना करना पडा है वह व्यक्ति आंखों पर नम भाव लाकर अपनी हार स्वीकार करने में कोताही बरते मेरी नजरों में वह व्यक्ति सबसे कमजोर है । याद रखिए अटल जी नें 13 दिनी सरकार में किस तरह जेब से इस्तीफा निकाल कर दिए थे क्या वह साहस है या ये साहस है कि कमरे में बंद होकर कायरों की तरह छुप जाओ और बाहर तुम्हारी सेना महाराज महाराज कह कर पुकार लगाती रहे ।

रविवार, 17 मई 2009

भविष्यवाणी पर यकिन क्यों ना करें ।



मैंने १४ मार्च २००९ को अपने ब्लॉग में इस बारे में लिखते हुए कहा था कि आडवाणी प्रधानमंत्री नही बनेंगे मेरे ये तथ्य किसी तरह हवा हवाई बातों से नही आए थे बल्कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणीयों के आधार पर मैने ये बातें लिखी थी अब आगे क्या होगा ये सभी भविष्य की बातें हैं लेकिन यकिन रखिए कि जब नास्त्रेदमस नें अपनी भविष्यवाणी में सांकेतिक रूप से मनमोहन सिंह का नाम लिये हैं तो जरूर कोई गहरी बातें भविष्य के गर्भ में होंगी ।

आगे का भविष्य मैने नास्त्रेदमस की नजरों से इस तरह समझा है कि हमें आतंकवाद का खतरा झेलते तो रहना ही होगा किंतु हम सुरक्षित रहेंगे और हमारी रक्षा स्वयं ईश्वर करेंगे । मनमोहन सिंह के बाद देश की मुखिया एक महिला बनेगी और उसके बाद आएगा एक दक्षिण भारतीय नेता जो इस देश के साथ साथ सारे विश्व में हिंदु धर्म का झंडा फहराएगा । सारे देश आतंक के खिलाफ लडने के लिए भारत के साथ आएंगे और अगली असली लडाई आतंक और भारत की अगुवाई में किसी दुसरे देश में लडी जाएगी । कब और कैसे के लिए एक महिला के प्रधानमंत्री बनने का इंतजार करना होगा । ...